बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

झांसी एक यात्रा व्रतांत

हमारा स्वभाव बहुत ही घुमक्क्ड किस्म का है तो निकल जाते हैं कहीं भी घूमने फिरने के लिये मौका मिलते ही साथ और यदी साथ देने के लिये कोई साथी मिल जाये तो और भी आनन्द मिलने की गारंटी हो जाती है।इससे एक और लाभ होता है कि आप की फोटो लेने के लिये आप को दुसरों की दया पर निर्भर नहीं रहना पडता। तो हम हमारे एक मित्र पंकज जी के साथ निकले थे।
ये एक सप्ताहांत यात्रा थी शनिवार और रविवार की। दिसंबर की रात में दिल्ली से दक्षिण एक्स्प्रेस से चले और सुबह ६ बजे झांसी स्टेशन पहूंच गये मौसम लगभग वही जो दिल्ली में होता है बस थोडी सी ठंड ज्यादा लग रही थी या यूं कहें कि दिल्ली में तो सुबह के ६ बजे हम रजाई के अन्दर ही रहते हैं।
स्टेशन से आटो किया और पहले से ही इन्टरनेट के माध्यम से बुक होटल चंदा में पहुंच गये होटल रूम को साफ सुथरा देख कर तसल्ली हुई क्यूं की कई बार आँनलाईन बुकिंग में दिखता कुछ है पर मिलता कुछ है। खैर इस बार हम खुसकिस्मत थे, चलिये होटल कि कुछ और बढाई भी कर देते हैं होटल के सामने एक बहुत ही खूबसूरत और बडा पार्क है
और कमरे की खिड्की से कोहरा होने पर भी झांसी का किला दिखाई दे रहा था।
जब सुबह के साढे छः बज रहे हों और घूमने जाने की जो प्राथमिकता थी वो इतना पास दिखाई दे रहा था तो सोचा कि थोडा सुस्ता लिया जाये। पंकज भाई भी आराम करने के मूड में थे तो उन्होंने नौ बजे का अलार्म लगाया और हम लोग सो गये , और फिर नौ बजे उठ कर रूम सर्विस से चाय सैंडविच का आर्डर किया। चाय नाश्ता कर के नहा धो कर तैयार हुए तो लगभग दस बज चुका था।

झांसी का किला चंदा होटल से

होटल से बाहर निकलने पर किले और हमारे बीच बस एक पार्क ही दिखाई दे रहा था उस पार्क का नाम रानी लक्ष्मी बाई पार्क है। फिर हम ने पार्क में से हो कर झांसी के किले कि ओर प्रस्थान किया कुछ दस मिनट चलने पर हम किले के दरवाजे पर थे जिस का प्रवेश शुल्क भारतिय नागरिक के लिये पांच रुपये है। किले के अन्दर जाते ही एक शिला लेख से किले के बारे में जानकारि प्राप्त हुई कि इसका निर्माण १६१३ ई. में राजा वीर सिंह जू देव ने कराया था इस किले पर बुन्देलों के शासन के बाद इस पर मुगलों ने राज किया और उस के बाद मराठा ने राज किया झांसी पर मराठों का नियंत्रण राजा गंगाधर राव के शासन काल १८५३ ई. तक जारी रहा। किले में शिव मन्दिर, गणेश मन्दिर, पंच महल, बारादरी दर्शनीय स्थल हैं किले के अन्दर ही कडक बिजली तोप भवानी शंकर तोप दर्शनार्थ रखी गयी। जहां से रानी लक्ष्मी बाई उन के दत्तक पुत्र को ले कर घोडे पर बैठ कर कूदीं थीं वो स्थल भी दर्शनीय है। देश में बहुत ही कम किले इतने बडे हैं ये किला सामरिक द्रष्टि से बहुत महत्वपूर्ण रहा होगा इस लिये इस को इतना मजबूत और सुरक्षित बनाया गया था।
 
झांसी का किला
झांसी का किला देखने के बाद हमारा दुसरा पडाव रानी महल था, किले से इस की दूरी बस ५ मिनट की थी यहां पर भी भारतिय नागरिक के लिये टिकिट ५ रुपये का है। ये रानी लक्ष्मी बाई का निवास स्थान था इस महल में २ मंजिल हैं और ६ कमरे हैं और भुतल पर संग्रहालय बना हुआ है और जिस में पुरातत्विक महत्व की मूर्तियां रखी हुई हैं और प्रथम तल पर दरवार हाल की छत और दीवारों पर की गयी चित्रकारी अनूठी है। 
 
रानी महल झांसी
रानी महल से निकलते हुए १२:३० बज चुके थे तो पंकज जी के साथ विचार किया कि अब झांसी राजकीय संग्रहालय देखते हैं वो हमारे होटल और किले के रास्ते में ही था। ये संग्रहालय किले के बहुत ही नजदीक है यहां पर भी टिकट ५ रुपये का है इस संग्रहालय में १५००० से ज्यादा कलाक्रतियां संग्रहित हैं जिस में पाषाण/ धातु मूर्तियां, शिलालेख, ताम्रपत्र, अस्त्र शस्त्र आदि हैं। संग्रहालय के अन्दर रानी लक्ष्मी बाई के जीवन पर ध्वनी एवं प्रकाश कार्यक्रम भी दिखाया जाता है।  संग्रहालय के अन्दर कैमरे का प्रयोग वर्जित है। ये संग्रहालय हर सोमवार और महिने के दूसरे रविवार को बन्द रहता है। 
 
झांसी संग्रहालय
संग्रहालय देख कर जब बाहर निकले तो २ बज चुके थे हमारे और पंकज जी दोनों के पेट में चूहे कूद रहे थे तो हम ने हमारे होटल की ओर प्रस्थान किया और खाने के लिये ओर्डर किया और कमरे में पहूंच कर भोजन आने का इन्तजार करने लग गये। भोजन आने पर पंकज जी को लगा कि पनीर बटर मसाला में तेल कुछ ज्यादा है तो उन्होंने रूम सर्विस वाले भाई को समझाया कि इस से इस से दिल की बीमारी होने का खतरा बढ जाता है। वो तो उन्होंने ध्यान दे दिया और अतिरिक्त तेल निकाल दिया नहीं तो सब्जी बनाने वाले ने तो उस को मारने का इन्त्जाम कर ही दिया था सर्विस वाले भाई ने भी माफी मांगी और हम ने भी भोजन पर हाथ मारना शुरू किया। पेट भरने के बाद हम आराम करने कि मुद्रा में आये और पंकज भाई पूरे जोश के साथ और भ्रमण करने के लिये तैयार थे। मैंने उन को कहा कि वो रिसेप्शन से अन्य पर्यटन स्थलों की जानकारी ले कर आयें तब तक मैं आराम कर लेता हूं। ये आइडिया भी कुछ खास काम नहीं कर पाया क्युं कि वो बस २० मिनट में जानकारी जुटा कर बापस आ गये उस हि जोश के साथ हमारे आराम करने के सभी तर्कों को उन्होंने खारिज कर के लगभग सवा चार बजे मुझे खिंचते हुए होटल से बाहर निकाल लिया।
अब हमारा अगला टार्गेट काली मन्दिर, लक्ष्मी मन्दिर लक्ष्मी तालाब और महाराजा गंगाधर राव की समाधी देखना था औटो किया और चल पडे दर्शन के लिये औटो बाले भाई ने बताया ये सारे स्थल लक्ष्मी तालाब के किनारे ही स्थित हैं। पुराने शहर के बीच में संकरे और भीड्भाड वाले रास्ते से २० मिनट मे लक्ष्मी तालाब पहुंचे। रास्ते में एक दरवाजा दिखा जो पुराने शहर की सरहद की दीवार से बाहर निकलने का दरवाजा था और उस दरवाजे पर हनुमान जी की प्रतिमा लगी हुई थी एसे सभी दिशाओं मे किले की घेरावंदी के लिये दीवार बनी हुई है और हर दिशा में दरवाजे पर हनुमान जी कि प्रतिमा लगी हुई है शहर की रक्षा के लिये। काली मन्दिर लक्ष्मी तालाब के किनारे पर एक नया बना हुआ मन्दिर है यहां से लक्ष्मी तालाब कि ओर द्रश्य बहुत ही मनोरम दिखता है, काली मन्दिर और लक्ष्मी मन्दिर के बीच में ही महाराजा गंगाधर राव की समाधि है। पहले हम लक्ष्मी मन्दिर गये ये मन्दिर देवी लक्ष्मी का मन्दिर हैं, जहां रानी लक्ष्मी बाई पूजा करने जाया करती थीं। लक्ष्मी मन्दिर की निर्माण कला अनूठी है ये मन्दिर देखने में एक महल जैसा प्रतीत होता है।

रात में झांसी का एक द्रश्य
लौटने पर महाराजा गंगाधर राव की समाधि देखी समाधी स्थल के चारों ओर बगीचा लगाया गया है एक शांत स्थल जैसे सभी जगह के समाधी स्थल होते हैं। लक्ष्मी तालाब में वोटिंग की व्यवस्था है किन्तु शाम होने के कारण उस का आनन्द नहीं लिया जा सका। ६:३० बज रहे थे शाम गहरा रही थी हम ने भी औटो लिया और होटल की ओर प्रस्थान किया रास्ते में देखा झांसी का किला फ्लड लाईट में जगमगा रहा था बहुत ही सुन्दर द्र्श्य था, ठंड भी बढ चुकी थी। हम रानी लक्ष्मी बाई पार्क के गेट पर ही औटो से उतर गये और पैदल ही टहलते हुए होटल की ओर गये पार्क में बच्चों के लिये झूले हैं लाईटिंग है फव्वारे हैं ये सब देखते हुए हम होटल पहूंच चुके थे। थकान हो रही थी रात के भोजन का ओर्डर किया रिसेप्शन पर बात कर के दूसरे दिन घूमने की रूपरेखा बनाई खा पी कर, थक कर और घोडे बेच कर सो गये।
रात को नींद अच्छी आयी सुबह नहा धो कर और चाय के साथ आलू के पराठे का नाश्ता कर के हम दोनों फिर से तैयार थे घूमने का आनन्द लेने के लिये आज का हमारा प्लान पहुंज बांध, सिध्देश्वर मन्दिर, सेंट ज्यूड चर्च देखने का था।
औटो लिया और निकल दिये पहुंज बांध के लिये ये बांध झांसी से आठ कि. मी. की दूरी पर स्थित है, ये बांध पंहुज नदी पर बना है इस लिये इस का नाम पहुंज बांध कहते हैं। पूरे झांसी शहर को इस ही बांध से पानी सप्लाई होता है और यहां पर जल विधुत भी बनाई जाती है। ये एक नयनाभिराम और रमणीय स्थल है दूर दूर तक पानी और पानी में उठती लहरें एक छोटा मोटा समुद्र होने का एहसास करायेंगी, ठंडी हवा के झोंके तन मन को शुकून देते हैं।

पंहुज बांध झांसी
पहुंज बांध से ना चाहते हुए भी बापस आना पडा क्युं की समय की कमी थी और बाकी जगह भी देखनी थी। रास्ते में सिध्देश्वर मन्दिर में दर्शन करे ये स्थान कई सारे मन्दिरों का समूह है। जहां विशेस मन्दिर पीताम्बरा देवी मन्दिर और शिव मन्दिर हैं, बहुत ही सुन्दर मन्दिर बने हुए हैं, सिध्देश्वर मन्दिर में दर्शन करने के बाद हम को जाना था सेंट ज्यूड चर्च देखने के लिये ये चर्च सेंट ज्यूड को समर्पित है और एशिया के सबसे बडा चर्च है।
सेंट ज्यूड चर्च झांसी
 
सिध्देश्वर मन्दिर झांसी
सेंट ज्यूड चर्च झांसी

लौटते हुए एक रेस्त्रां में छोले भटूरे खाये और होटल पहुंचे ३:३० हो रहा था। होटल पहुंच कर कुछ देर आराम किया फिर सामान पैक किया रात के ९:३० पर दिल्ली जाने वाली दक्षिण एक्सप्रेस पकडी और फिर ओफिस और काम, ये कुछ पल अपनी मर्जी से जीना यही तो जिन्दगी का बोनस है।
:एक यात्री का यात्रा व्रतांत
 


 




8 टिप्‍पणियां:

  1. ज्ञानवर्धक यात्रा वृतांत, ब्लॉग जगत में स्वागत है.

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  2. बढ़िया प्रयास
    ज़ारी रखिये

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  3. its really informative writing, you made me to think to travel these places, kindly let us know the average travel cost for the same 2 days one night trip

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  4. about this trip,
    hotel stay for 2 days - 1600 Rs.
    Breakfast Lunch Dinner and Snacks- 1200 Rs.
    Local Sight Seeing - 1100 Rs.
    Rs. 3900 for 2 means Rs. 1950 per person

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